ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध के चलते मध्य पूर्व की शिपिंग रूट्स पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गए हैं। दुबई के सबसे बड़े कंटेनर पोर्ट जेबेल अली पर ऑपरेशन्स लगभग ठप पड़ गए हैं, जिससे महाराष्ट्र के फल-सब्जी निर्यातकों की सैकड़ों खेपें फंस गई हैं। सूत्रों के मुताबिक, 800 से 1000 के बीच भारतीय कंटेनर दुबई में अटके हुए हैं, जबकि मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) पर भी हजारों कंटेनर शिपमेंट के इंतजार में खड़े हैं।
रमजान के मौके पर खाड़ी देशों (दुबई, कुवैत, कतर, सऊदी अरब) में भारतीय फल-सब्जियों की मांग सबसे ज्यादा होती है। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद (28 फरवरी से) पोर्ट पर अनलोडिंग रुक गई। इन कंटेनरों में मुख्य रूप से नासिक का प्याज, अंगूर, केला, अनार, पपीता, तरबूज और अन्य ताजा फल-सब्जियां भरी हैं। रेफ्रिजरेटेड कंटेनरों में रखे माल की शेल्फ लाइफ खत्म हो रही है और सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
निर्यातकों की चिंता
पुणे के प्रमुख निर्यातक दानेश शाह ने बताया, “हमने रमजान और ईस्टर को ध्यान में रखकर खासतौर पर फसल उगाई थी। अब दुबई पोर्ट बंद होने से सारा माल फंस गया है। एक-एक कंटेनर में 13-30 टन माल होता है। रोजाना रेफ्रिजरेशन और डिटेंशन चार्जेस पर 7,000-8,000 रुपये खर्च हो रहे हैं। अगर 4-5 दिन और यही हाल रहा तो लाखों टन माल बर्बाद हो जाएगा।”
हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (HPEA) के वाइस प्रेसिडेंट विकास सिंह ने कहा, “केवल नासिक से ही 150 से ज्यादा प्याज के कंटेनर फंसे हैं। कुल 200+ कंटेनर दुबई जाने वाले फ्रेश प्रोड्यूस के JNPT पर अटके हैं। 370 कंटेनर तो पहले ही दुबई पहुंच चुके थे, वे भी वहीं फंसे पड़े हैं।”
कितना नुकसान?

एक कंटेनर की औसत कीमत: 25-45 लाख रुपये (माल के हिसाब से)
कुल अनुमानित नुकसान: अभी 50-100 करोड़ रुपये से ज्यादा, लेकिन हर घंटे बढ़ रहा है
महाराष्ट्र के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित – नासिक, पुणे, नंदुरबार, सोलापुर आदि जिलों के हजारों किसान इस निर्यात पर निर्भर हैं

कई निर्यातक अब “बैक टू टाउन” एप्लीकेशन फाइल कर रहे हैं ताकि कंटेनर वापस लाकर घरेलू बाजार में माल बेचा जा सके। लेकिन ताजा माल की कीमतें गिरने का खतरा है और स्टोरेज का अतिरिक्त खर्च भी बढ़ रहा है।
सरकार और APEDA का रुख
एपीडा (APEDA) ने निर्यातकों से फंसे माल की डिटेल मांगी है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय स्थिति पर नजर रखे हुए है। सूत्रों का कहना है कि वैकल्पिक रूट (केप ऑफ गुड होप) से शिपमेंट करने पर 15-20 दिन extra लगेंगे, जिससे फ्रेट चार्ज दोगुने से ज्यादा हो गए हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
ट्रेड एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध 7-10 दिन और चला तो खाड़ी देशों में भारतीय फल-सब्जियों की सप्लाई पूरी तरह रुक जाएगी। इससे न सिर्फ निर्यातकों को बल्कि भारतीय किसानों की आमदनी पर भी भारी असर पड़ेगा।
अपडेट: फिलहाल पोर्ट अथॉरिटी ने कोई आधिकारिक समयसीमा नहीं बताई है कि कब ऑपरेशन्स सामान्य होंगे। निर्यातक सरकार से तुरंत हस्तक्षेप और वैकल्पिक बंदरगाहों की व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
यह संकट सिर्फ फल-सब्जी तक सीमित नहीं है – बासमती चावल, दालें और अन्य सामान भी प्रभावित हो रहे हैं। अधिक जानकारी और लाइव अपडेट के लिए हमारे पोर्टल पर बने रहें।