मुंबई | 12 अप्रैल 2026

बांग्ला सिनेमा के महान फिल्मकार ऋत्विक घटक (1925–1976) की रचनात्मक विरासत पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम मीरा रोड स्थित विरूंगला केन्द्र, इंदिरा गांधी हॉस्पिटल में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन जनवादी लेखक संघ और स्वर संगम फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

इस अवसर पर जाहिद खान और जयनारायण प्रसाद द्वारा संपादित पुस्तक ‘ऋत्विक घटक: नव यथार्थवाद सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ का विमोचन किया गया। साथ ही, कृष्ण चंदर के प्रसिद्ध उर्दू नाटक ‘दरवाजा खोल दो’ के हिंदी अनुवाद का भी लोकार्पण हुआ, जिसका अनुवाद जाहिद खान ने किया है।

सिनेमा और मार्क्सवाद पर चर्चा

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पुलक चक्रवर्ती ने बताया कि ऋत्विक घटक की वैचारिक जड़ें मार्क्सवाद में गहराई से निहित थीं। वे 1948 में भारतीय जन नाट्य संघ (IPTA) से जुड़े, जो उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक मोर्चा था।

उन्होंने कहा कि विभाजन, अकाल और सामाजिक अन्याय जैसे अनुभवों ने घटक के सिनेमा को वैचारिक धार दी। उनकी फिल्मों में वर्ग संघर्ष, विस्थापन और सामाजिक विघटन की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है।

विभाजन त्रयी और सिनेमा की विरासत

ऋत्विक घटक की फिल्मों को भारतीय सिनेमा में एक अलग धारा के रूप में देखा जाता है। उनकी प्रसिद्ध फिल्म मेघे ढाका तारा को उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है, जो शरणार्थी जीवन और स्त्री-त्याग की मार्मिक कहानी कहती है।

इसके अलावा कोमल गांधार, सुवर्णरेखा, अजान्त्रिक, तितास एक्टी नदीर नाम और जुक्ति तक्को आर गप्पो जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने समाज, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से प्रस्तुत किया।

फिल्म निर्माण की चुनौतियाँ

फिल्म निर्देशक अविनाश दास ने कहा कि ऋत्विक घटक का सिनेमा सबसे अधिक मौलिक है और उन्होंने सिनेमा की अपनी भाषा विकसित की। उन्होंने फिल्म निर्माण की कठिनाइयों का जिक्र करते हुए चंद्रप्रकाश द्विवेदी के हवाले से कहा, “डायरेक्टर का जन्म अपमानित होने के लिए होता है।”

अविनाश दास ने यह भी बताया कि घटक ने हमेशा अपनी शर्तों पर सिनेमा बनाया, जो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

सिनेमा को समझने की जरूरत

डॉ. हूबनाथ पांडे ने अपने शोध अनुभव साझा करते हुए कहा कि भाषा की बाधा के बावजूद उन्होंने घटक की फिल्मों को विजुअल माध्यम से समझा। उन्होंने फिल्म सोसाइटी की आवश्यकता पर जोर देते हुए हर महीने एक फिल्म दिखाने का प्रस्ताव भी रखा।

घटक की पहचान और योगदान

पुस्तक के संपादक जाहिद खान ने कहा कि हिंदी पट्टी में ऋत्विक घटक को अक्सर ‘मधुमती’ और ‘मुसाफिर’ जैसी फिल्मों के स्क्रिप्ट लेखन से जाना जाता है, जबकि वे सत्यजीत राय और मृणाल सेन के साथ भारतीय सिनेमा के क्लासिकल निर्देशकों में गिने जाते हैं।

सिनेमा: मनोरंजन से आगे

जलेस के केंद्रीय कमेटी सदस्य संजय भिसे ने कहा कि ऋत्विक घटक ने सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे इतिहास, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा।

कार्यक्रम में जयनारायण प्रसाद, अजय रोहिल्ला, हरि मृदुल, फरीद खान सहित कई सिने एवं साहित्य जगत से जुड़े लोगों ने अपने विचार रखे।

फिल्म सोसाइटी की पहल
स्वर संगम फाउंडेशन के चेयरमैन हृदयेश मयंक ने बताया कि मीरा रोड में फिल्म सोसाइटी बनाने के प्रस्ताव पर जल्द ही विचार किया जाएगा।

कार्यक्रम का संचालन रमन मिश्र ने किया, जबकि हरिप्रसाद राय ने आभार व्यक्त किया।